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शुरुआती अभ्यासार्थियों के लिये योग (Yoga For Beginners)

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योग

आज हम आपको इस लेख के लिए योग के बारे में संपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं इसे पढ़ने के बाद अगर आप योग शुरू करने की सोच रहे हैं तो आपकी सारी संकाएं दूर हो जाएंगी। ये लेख उन लोगों के लिए ज्यादा लाभकारी रहेगा जो लोग अभी योग करने की सोच रहे हैं या फिर योगाभ्यास शुरू किए हैं।

क्या है योग | What is Yoga

योग को परिभाषित करना थोड़ा मुश्किल हैं, क्योंकि कई विशेषज्ञों व जानकारों ने योग को लेकर अपने भिन्न भिन्न विचार प्रस्तुत किए हैं। लेकिन योग के शाब्दिक अर्थ पर गौर किया जाए तो योग शब्द के दो अर्थ हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। पहला है- जोड़ और दूसरा है समाधि। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ते तो समाधि तक पहुँचना असंभव हो जाता है। योग को दर्शन, धर्म या फिर गणित की उपाधि देना गलत होगा क्योंकि ये उससे कुछ ज्यादा है। योग संस्कृत धातु ‘युज’ से उत्‍पन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्यक्तिगत चेतना या आत्मा का सार्वभौमिक चेतना या रूह से मिलन।

वैसे यह बात भी सच है कि योग, भारतीय ज्ञान की पांच हजार वर्ष पुरानी शैली है। वैसे कुछ लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम ही मानते हैं, लेकिन यह वास्तव में केवल मनुष्य के मन और आत्मा की अनंत क्षमता का खुलासा करने वाले इस गहन विज्ञान के सबसे सतही पहलू हैं, योग का अर्थ इन सब से कहीं बड़ा है। तभी तो योगविज्ञान में जीवन शैली का पूर्ण सार आत्मसात किया गया है। अब तक तो आपको योग का अर्थ समझ आ ही गया होगा।

योग का इतिहास | History Of Yoga

बात करें योगके इतिहास की तो यह दस हजार साल से भी अधिक समय से प्रचलन में है। योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है, हालांकि अब इसका बहुत सारा इतिहास नष्ट हो गया है। किन्तु जिस तरह राम-कृष्ण, बुद्ध, महावीर के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है। योग विद्या में शिव को पहले योगी या आदि योगी तथा पहले गुरू या आदि गुरू के रूप में माना जाता है।

वैसे पहली बार 200 ई.पू. पतंजलि ने वेद में बिखरी हुई योग विद्या का सही रूप से बांटा। इसके बाद ही योग का प्रचलन बढ़ा और यौगिक संस्थानों, पीठों तथा आश्रमों का निर्माण होने लगा, जिसमें केवल राजयोग की शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी। योग को सही रूप से विभाजित करने के कारण ही पतंजलि को योग के पिता के रूप में माना जाता है और उनके योग सूत्र पूरी तरह योग के ज्ञान के लिए समर्पित रहे हैं।

योग के प्रकार | Types of Yoga

योगके 4 प्रमुख प्रकार यानि की योग के चार रास्ते हैं

राजयोग

इसमें पहला है राजयोग, योग की इस शाखा का सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग है ध्यान। इस योग के आठ अंग है, जिस कारण से पतंजलि ने इसका नाम रखा था अष्टांग योग। ये आठ अंग इस प्रकार है: यम (शपथ लेना), नियम (आचरण का नियम या आत्म-अनुशासन), आसन, प्राणायाम (श्वास नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रियों का नियंत्रण), धारण (एकाग्रता), ध्यान (मेडिटेशन), और समाधि (परमानंद या अंतिम मुक्ति)। राज योग आत्मविवेक और ध्यान करने के लिए तैयार व्यक्तियों को आकर्षित करता है।

कर्मयोग

अब बात करते हैं योगासन के दूसरी शाखा की जो है कर्म योग यानि की सेवा का मार्ग। यह भी सच है कि हम में से कोई भी इस मार्ग से नहीं बच सकता है। कर्म योग का सिद्धांत यह है कि जो आज हम अनुभव करते हैं वह हमारे कार्यों द्वारा अतीत में बनाया गया है। इस बारे में जागरूक होने से हम वर्तमान को अच्छा भविष्य बनाने का एक रास्ता बना सकते हैं, जो हमें नकारात्मकता और स्वार्थ से बाध्य होने से मुक्त करता है। कर्म आत्म-आरोही कार्रवाई का मार्ग है। जब भी हम अपना काम करते हैं और अपना जीवन निस्वार्थ रूप में जीते हैं और दूसरों की सेवा करते हैं, हम कर्म योग करते हैं।

भक्तियोग

बात करें भक्ति योग की तो इसमें भक्ति का रास्ता दिखाता है, यह सभी के लिए सृष्टि में परमात्मा को देखकर, भक्ति योग भावनाओं को नियंत्रित करने का एक सकारात्मक तरीका है। यह सच है कि भक्ति का मार्ग हमें सभी के लिए स्वीकार्यता और सहिष्णुता पैदा करने का अवसर प्रदान करता है।

ज्ञानयोग

अब बारी आती है ज्ञान योग की तो अगर हम भक्ति को मन का योग मानते हैं, तो ज्ञान योग बुद्धि का योग है। इस पथ पर चलने के लिए योग के ग्रंथों और ग्रंथों के अध्ययन के माध्यम से बुद्धि के विकास की आवश्यकता होती है। ज्ञान योग को सबसे कठिन माना जाता है और साथ ही साथ सबसे प्रत्यक्ष। इसमें गंभीर अध्ययन करना होता है और उन लोगों को आकर्षित करता है जो बौद्धिक रूप से इच्छुक हैं।

सभी के लिए फायदेमंद है ये योगासन | Top yoga poses beneficial for everyone

हम बात करेंगे उन आसनों की जिसे हर किसी को करना चाहिए और इससे हर कोई स्वस्थ रहेगा।

योगमुद्रासन- इस आसन में व्यक्ति को जमीन पर पैर सामने फैलाकर बैठना है इसके बाद बाएं पैर को उठाकर दांई जांघ पर इस प्रकार लगाइए की बांए पैर की एड़ी नाभि के नीचे आए। इसके बाद दांए पैर को उठाकर इस तरह लाइए की बांए पैर की एड़ी के साथ नाभि के नीचे मिल जाए। फिर आपको अपने दोनों हाथ पीछे ले जाकर बाएं हाथ की कलाई को दाहिने हाथ से पकड़ना है। इसके बाद आपको श्वास छोड़ते हुए सामने की ओर झुकना होगा और अब नाक को जमीन से लगाने का प्रयास करें। यही क्रिया आपको हाथ बदलकर फिर से करना है और दोबारा पैर बदलकर इस आसन की पुनरावृत्ति करें। इस आसन को हर रोज करने से चेहरा सुन्दर, स्वभाव विनम्र व मन एकाग्र होता है।

उदाराकर्षण- बात करें उदाराकर्षण की तो इस आसन में बैठ जाइए हाथों को घुटनों पर रखते हुए पंजों के बल उकड़ू (कागासन) काग की तरह बैठना है। इसके बाद पैरों में लगभग सवा फुट का अंतर होना चाहिए। वहीं ध्यान रहे कि श्वास अंदर भरते हुए दांए घुटने को बांए पैर के पंजे के पास टिकाइए तथा बांए घुटने को दांई तरफ झुकाइए। इसके बाद अपने गर्दन को बांई ओर से पीछे की ओर घुमाइए व पीछे देखिए। कुछ ही समय तक आपको रूकना होगा, फिर श्वास छोड़ते हुए बीच में आ जाइए। इसी प्रकार इसे दूसरी ओर से करें। इस आसन में की गई सारी प्रक्रिया उदर रोग तथा कब्ज मंदागिनी, गैस, अम्ल पित्त, खट्टी-खट्टी डकारों का आना एवं बवासीर आदि निश्चित रूप से दूर होते हैं।

स्वस्तिकासन- अब बारी आती है स्वस्तिकासन की तो बाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाहिनी जांघ और पिंडली के बीच इस प्रकार स्थापित करें कि बाएं पैर का तल छुप जाए। इसके बाद दाहिने पैर के पंजे और तल को बाएं पैर के नीचे से जांघ और पिंडली के मध्य स्थापित करें। बता दें कि यह स्वस्तिकासन की मुद्रा है। अब ध्यान मुद्रा में बैठें और रीढ़ सीधी कर श्वास खींचकर यथाशक्ति रोकें। इस प्रक्रिया को पैर बदलकर भी करें। ध्यान रहे कि इसके नियमित रूप से अभ्यास की तो इससे पैरों का दर्द और पसीना आना दूर होता है। नियमित अभ्यास से पैरों के गर्म या ठंडेपन की शिकायत भी दूर होती है। ध्यान लगाने के लिए यह आसन सबसे उत्तम है।

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गोमुखासन- गोमुखआसन भी इस आसन में आता है जिसमें आपको अपने पैर सामने फैलाकर बैठें। बांए पैर को मोड़कर एड़ी को दाएं नितम्ब के पास रखें। यही नहीं दांए पैर को मोड़कर बांए पैर के ऊपर इस प्रकार रखें कि दोनों घुटने एक दूसरे के ऊपर हो जाएं। दाएं हाथ को ऊपर उठाकर पीठ की ओर मोड़िए और बांए हाथ को पीठ के पीछे नीचे से लाकर दांए हाथ को पकड़ना होगा। वहीं ध्यान रहे कि इस अवस्था में आपकी गर्दन और कमर दोनो सीधी रहे। इस आसन को करते समय ध्यान रखें कि जिस ओर का पैर ऊपर रखा जाए उसी ओर का (दाए/बाएं) हाथ ऊपर रखें। इस आसन के नियमित अभ्यास से अंडकोष वृद्धि एवं आंत्र वृद्धि में विशेष लाभ मिलता है।

गोरक्षासन- गोरक्षासन में आपको अपने दोनों पैरों की एड़ी तथा पंजे आपस में मिलाकर सामने रखिए। अब सीवनी नाड़ी (गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय के मध्य) को एडियों पर रखते हुए उस पर बैठ जाइए। दोनों घुटने भूमि पर टिके हुए हों। हाथों को ज्ञान मुद्रा की स्थिति में घुटनों पर रखें। यही नहीं इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करें। इससे मांसपेशियो में रक्त संचार ठीक रूप से होकर वे स्वस्थ होती हैं। इन्द्रियों की चंचलता समाप्त कर मन में शांति प्रदान करता है।

अर्द्धमत्स्येन्द्रासन- इस आसन को करते समय आपको दोनों पैर सामने फैलाकर बैठना होगा इसके बाद बांए पैर को मोड़कर एडी को नितम्ब के पास लगाएं। बांए पैर को दांए पैर के घुटने के पास बाहर की ओर भूमि पर रखें। बांए हाथ को दांए घुटने के समीप बाहर की ओर सीधा रखते हुए दांए पैर के पंजे को पकडे़ं। दांए हाथ को पीठ के पीछे से घुमाकर पीछे की ओर देखें। इसी प्रकार दूसरी ओर से इस आसन को करें। वहीं ध्यान रहे कि इसे लगातार करने से मधुमेह एवं कमरदर्द में लाभकारी ये आसन मेरुदंड के पास की नसों और नाड़ियों में रक्त का संचार सुचारू रूप से चलाने में मदद करती है।

घर में योगाभ्यास करने का सही तरीका |Right way to do yoga at home

ये समय ऐसा है कि हर कोई योग को अपने जीवन का हिस्सा बना रहा है, लेकिन इस बीच कई लोगों को ये समस्या आ रही है कि आखिर योग को सही तरीके से कैसे किया जाए ? क्योंकि जो नए लोग जिन्होने योग करना अभी शुरू किया है उन्हें इसके सही तरीके के बारे में कुछ भी आइडिया नहीं है। इसलिए आज हम आपको घर में योग करने के सही तरीके के बारे में बताएंगे जिसे फॉलो कर आप अपने घर में योग शुरू कर सकते हैं।

कई लोगों के मन में रहता है कि हमें योग सुबह के समय ही करना चाहिए और हालांकि ये सही भी है क्योंकि इसे सबसे उपयुक्त समय माना गया है। लेकिन जरूरी नहीं है कि अगर आप सुबह योगासन नहीं कर पाएं तो फिर दिन में कभी योग नहीं कर सकेंगे। इसके लिए आप अपना सुविधाजनक समय चुन सकते हैं।

कोशिश करें कि योग करने के लिए आप एकांत जगह चुने चाहे वो आपके घर में एक छोटा, निजी कमरा ही क्यों न हो। अगर यह संभव न हो तो घर में कोई शान्तिपूर्ण स्थान चुन सकते हैं जो इतना बड़ा हो कि वह आप अपना योगा मैट (चादर) बिछा सके। योग आपको और आपके परिवार को प्रसन्नता ,शक्ति और आराम देगी।

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आपके आसान तब अच्छे होते हैं जब उसे आप हलके या खाली पेट करे। आप भोजन के 2 या 3 घण्टे बाद योगाभ्यास कर सकते हैं।

ध्यान रहे कि जब आप योगासन कर रहे हों तो उस समय हल्के एवं आरामदायक कपड़े पहने। तंग कपड़े योगाभ्यास के लिए सुविधाजनक नहीं होते।

यह आवस्यक हैं कि योगासन से पहले शरीर में लचीलापन उत्पन्न करने वाले कुछ व्यायाम करें जिससे माश्पेशियो में कोई तनाव न उत्पन्न हो।

इसके अलावा जब आप योगाभ्यास कर रहे हों तो इस बात का ध्यान रहे कि आप खाली पेट ही करें।

आप अगर घर पर योग कर रहे हैं तो आए दिन अलग योगाभ्यास अवं प्राणायाम का अभ्यास करें। अगर आपके पास समय नहीं है तो आप हर दिन अलग अलग योग बांट लें इसके अनुरूप योग करें। हो सके तो रविवार के दिन सभी योग को करें । यह निश्चित करे कि योगाभ्यास के साथ योग निद्रा लें।

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