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गणेश चतुर्थी: 10 दिनों के लिए ही क्यों मनाया जाता है? (why we celebrate Ganesh Chaturthi for 10 days)

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गणेश चतुर्थी

हिंदू धर्म में हर माह कोई न कोई महत्वपूर्ण त्योहार आता ही रहता है। हर त्योहार का अपना अलग महत्व होता है वो अपने आप में विशेष होता है। ये सभी त्योहार भारत के कई राज्यों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि भाद्रपद का महीना चल रहा है, हर साल की तरह इस साल भी इस मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) का पर्व मनाया जा रहा है।

यह त्योहार महाराष्ट्र में और भी धूमधाम से मनाया जाता है, यहां लोग गणेश चतुर्थी के दिन लोग ढोल नगाड़ों के साथ गणपति बप्पा को अपने घर लेकर आते हैं, सारा वातावरण गणपति बप्पा मोर्या के जयकारों से गूंज उठता है। इस साल गणेश चतुर्थी का ये त्योहार 22 अगस्त को मनाया जाएगा, आप भी इस दिन बप्पा को अपने घर लाकर विराजमान करके उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

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10 दिन ही क्यों मनाया जाता है गणेश चतुर्थी ?

शास्त्रों की मानें तो इस समय यह पर्व मनाने का महत्व ये है कि इसी दिन भगवान श्री गणेश जी ने जन्म लिया था। ज्योतिषियों व विद्वानों का मानना है कि पहले के समय में इस पर्व को सिर्फ 1 दिन ही धूम-धाम से मनाया जाता था लेकिन अब गणेश उत्सव 10 दिनों तक मनाया जाने लगा है और 11वें दिन यानि की अनंत चतुर्दशी पर भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

कई लोगों के मन में ये सवाल आता है कि आखिर 1 दिन मनाया जाने वाला ये पर्व 10 दिनों तक क्यों और कैसे मनाया जाने लगा? हालांकि इसका जवाब काफी कम लोगों के पास है लेकिन इसके पीछे भी एक खास वजह है। यह कहानी हजारों वर्ष पूरानी है, जी हां जब भारत में पेशवा शासन कर रहे थे उसी समय से गणेश चतुर्थी काफी भव्य रुप से मनाया जाता है। जिन दिनों सवाई माधवराव पेशवा का पुणे में शासन था उन्हीं दिनों पुणे के प्रसिद्ध शनिवारवाड़ा नामक राजमहल में गणेशोत्सव काफी धूम-धाम से मनाया जाता था।

इसके बाद जब अंग्रेजों ने भारत पर कब्ज़ा किया तो उन्होंने पेशवाओं के राज्य पर भी अपना अधिकार जमा लिया और फिर गणेशोत्सव की भव्यता में साल दर साल कमी आने लगी लेकिन फिर भी यह परंपरा चली आ रही थी पर उस अनुसार हिंदू यह पर्व नहीं मना पा रहे थें जैसा पहले करते थें। लोग नकारात्मकता की ओर बढ़ने लगे थें और अंग्रेजों के विचार के प्रति लोगों का आकर्षण होने लगा था।

उन दिनों महान क्रांतिकारी व जननेता लोकमान्य तिलक ने हिंदू धर्म को संगठित करने का विचार बनाया तब लोकमान्य तिलक के दिमाग में ये विचार उत्पन्न हुआ कि भगवान गणेश जी हीं मात्र एक ऐसे देवता हैं, जिन्हें सभी समाज के लोग पूजनीय मानते हैं और चुकी ये धार्मिक उत्सव है, इसलिए अंग्रेज इसमें दखल अंदाजी नहीं करेंगे जिसके लिए लोकमान्य तिलक ने सन 1893 में पुणे में सार्वजनिक गणेशोत्सव कि शुरुआत की थी और गणेशोत्सव को लोकमान्य तिलक ने आजादी की लड़ाई के लिए प्रभावशाली साधन बनाने का भी काम किया।

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देखते ही देखते महाराष्ट्र में गणेश उत्सव एक बार फिर से धूम-धाम से मनाया जाने लगा। इस दौरान दूसरे धर्मों के लोग हिंदू धर्म पर हावी होने लगे थे तब जाकर लोकमान्य तिलक ने इस संबंध में एक सभा का आयोजन किया और यह निर्णय लिया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तक गणेश उत्सव धूम-धाम से मनाया जाएगा। तभी से 10 दिनों तक भगवान गणेश का ये उत्सव हर साल जोर-शोर से मनाया जाने लगा।

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