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भगवान शिव को महाकाल क्यों कहा जाता है? (Why is Lord Shiv called Mahakal)

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महाकाल

हिंदू धर्म में भगवान शिव का बेहद ज्यादा ही महत्व है, इन्हें देवों के देव महादेव के रूप में पूजा जाता है। हालांकि शिवजी के बहुत सारे नामों जैसे महादेव, महाकार, शिवशंभू, देवाधिदेव, भोलेनाथ आदि से पुकारा जाता है। उन्हें अजन्मा भी माना गया है यानि उनका कोई आरंभ है न अंत है। न उनका जन्म हुआ है, न वह मृत्यु को प्राप्त होते हैं। शिव जी को महाकाल के नाम से जाना जाता हैं इसलिए उन्हें कालों का काल भी कहते है।शिवपुराण और स्कंदपुराण में महाकाल ज्योर्तिलिंग की महिमा का पूरे विस्तार के साथ वर्णन किया गया है। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर इन्हें महाकाल क्यों कहा जाता है ? क्या है इसके पिछे का कारण ?

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क्या है महाकाल का अर्थ

शिव जी को महाकाल क्यों कहा जाता है इससे पहले आपको महाकाल का अर्थ जानना जरूरी है। दरअसल इसका अर्थ है काल से भी ऊपर, या काल की परिधि से बाहर। महाकाल का अर्थ क्या है? काल शब्द के दो अर्थ हैं। काल का एक मतलब होता है वक्त। काल का दूसरा अर्थ अंधकार भी है। एक ही शब्द के दो मायने मसलन वक्त और अंधकार कैसे हो सकते हैं ?

शिव तीनों देवो में विनाश के कारक है, विनाश या प्रलय के बाद सारी सृष्टि एक नए सिरे से शुरू होती है। ऐसे में सब कुछ उस प्रलय में विलय हो जाता है अर्थात सभी समय के अंतर्गत ही आते है और सबका विनाश निश्चित है।

इसी क्रम में न केवल सृष्टि बल्कि इंद्र, ब्रह्मा, यहाँ तक की श्री विष्णु का भी विनाश और सृजन होता रहता है। इसीलिए यह सभी भी काल की परिधि में आते है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि महाकाल की गोद में यह सृष्टि बेहद तुच्छ है। विशाल आकाशगंगाएं हैं, लेकिन फिर भी उन्हें इस सृष्टि का एक छोटा सा कण कहा जा सकता है।

भगवान शिव को क्यों कहते हैं महाकाल ?

शास्त्रों व विद्वानों की मानें तो महादेव मनुष्य के शरीर में प्राण के प्रतीक माने जाते हैं जिस व्यक्ति के अन्दर प्राण नहीं होते हैं तो उसे हम शव कहते हैं। ऐसे में भगवान शिव को त्रिदेवों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। शिव को मृत्युलोक का देवता माना जाता है। यह बात तो आपको पता ही होगी की भगवान शिव के तीन नेत्रों वाले हैं इसलिए त्रिदेव कहा गया है। वहीं दूसरी ओर ब्रम्हा जी सृष्टि के रचयिता माने गए हैं और विष्णु को पालनहार माना गया है, भगवान शंकर संहारक के रूप में माना गया है। यह केवल लोगों का संहार करते हैं। भगवान भोलेनाथ संहार के अधिपति होने के बावजूद भी सृजन का प्रतीक हैं।

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हालांकि इसके अलावा पंचतत्वों में शिव को जगह प्राप्त है जहां पर उन्हें वायु का देवता माना गया है। वायु जब तक शरीर में चलती है, तब तक शरीर में प्राण बने रहते हैं लेकिन जब वायु क्रोधित होती है तो प्रलयकारी बन जाती है। जब तक वायु है, तभी तक शरीर में प्राण होते हैं। यानि की अगर शिव वायु के प्रवाह को रोक दें तो फिर वे किसी के भी प्राण ले सकते हैं, वायु के बिना किसी भी शरीर में प्राणों का संचार संभव नहीं है।

महाकाल रूप में शिव एक परिपूर्ण स्वस्थ जीवन का आशीष देते हैं और अंतकाल में शिव में विलीन होकर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का आश्वासन। इसी में जीवन की श्रेष्ठता है, क्योंकि भौतिक प्रगति व आध्यात्मिक उन्नति के बीच समन्वय स्थापित हो जाता है।

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