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‘राम नाम सत्य है’ का जाप शवयात्रा के समय क्यों? (Why ‘Ram Naam Satya Hai’ is said during funeral)

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राम नाम सत्य है

हम सभी अपने जीवन में कुछ ऐसी चीजें फॉलोव करते आ रहे हैं जो हमारे बड़े बुजुर्गों ने हमसे कहा। हालांकि कई बार इन चीजों को देखकर मन में सवाल भी उत्पन्न होता है लेकिन किसी ने उसका जवाब तक नहीं दिया या फिर कई बार हम ये सवाल पूछ भी नहीं पाते हैं। इनमें से ही एक ऐसी प्रथा के बारे में आज हम आपको बताएंगे जो आप देखते तो जरूर होंगे लेकिन इसे लेकर आपके मन में जो सवाल आते होंगे उसे आप पूछ नहीं पाते होंगे। ‘राम नाम सत्य है’ के बारे में हम विस्तृत जानकारी देने जा रहे हैं।

मृत्यु व जीवन हम सभी में से किसी के हाथ में नहीं है यह विधि का विधान है और इसकी डोर संसार के रचयिता के हाथ में है इसलिए इसपर हमारा वश नहीं चलता लेकिन हां कुछ मान्यताएं हैं जो मृत्यु के बाद पूरे किए जाते हैं और कहा जाता है कि यह करना बेहद जरूरी है। अगर आप हिंदू धर्म में विश्वास रखते हैं तो प्राचीन समय से हम देखते और सुनते आ रहे हैं कि जब भी कोई मनुष्य मृत्यु के मुंह में जाता है तो उसके शव को शमशान में ले जाते समय उनके परिजन ‘राम नाम सत्य है’ ये बोलते हैं।

इस तरह बोलते हुए मृतक के शरीर को शमशान भूमि की ओर ले जाते हैं। यह होते हुए तो हमने कई बार देखा है लेकिन आज तक ये नहीं पता चल पाया कि आखिर उस दौरान ये बोलने का असल उद्देश्य क्या है ? काफी कम ही लोग होंगे जो इसके बारे में जानते होंगे, बाकी के लोग तो बस ऐसे ही इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं।

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राम नाम सत्य है के पीछे छिपे होते हैं कई कारण

यह बात सच है कि हमारे हिन्दू धर्म में कई परंपराएं व संस्कार निभाए जाते हैं लेकिन इस बात को भी झूठलाया नहीं जा सकता कि इन संस्कारों के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण बताए गए हैं। आज हम आपको इस विशेष संस्कार के बारे में भी बताएंगे कि आखिर शवयात्रा के समय इसमें शामिल होने वाले लोग ‘राम नाम सत्य है’ को ही क्यों बोलते हैं? इसके पीछे क्या कारण है?

दरअसल इसका जिक्र महाभारत के पात्र धर्मराज युधिष्ठिर ने एक श्लोक के माध्यम से किया है जिसमें उन्होने बताया है कि मृतक को जब शमशान ले जाते हैं तब कहते हैं ‘राम नाम सत्य है’ परंतु जैसे ही घर लौटे तो राम नाम को भूल माया-मोह में लिप्त हो जाते हैं। मृतक के घर वाले ही सबसे पहले मृतक के धन को संभालने की चिंता में लगते हैं। इस श्लोक के जरिए धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा है कि धर्मराज युधिष्ठिर आगे कहते हैं कि, “नित्य ही प्राणी मरते हैं, लेकिन अन्त में परिजन सम्पत्ति को ही चाहते हैं इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य होगा?

शास्त्रों में कहा गया है कि शवयात्रा के दौरान ‘राम नाम सत्य है’ राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत है’ बोलने का मतलब मृतक को सुनाना नहीं होता है बल्कि इसे कहने का उद्देश्य साथ में साथ में चल रहे परिजन, मित्रों को केवल यह समझाना होता है कि जिंदगी में और जिंदगी के बाद भी केवल राम नाम ही सत्य है बाकी सब व्यर्थ है। एकदिन सबकुछ यहीं छोड़कर जाना है। साथ में सिर्फ हमारा कर्म ही जाता है। आत्मा को गति सिर्फ और सिर्फ राम नाम से ही मिलेगी।

जब राम के नाम का जप किया जाता है, तब आत्मा से मुक्ति मिलती है। अंतिम संस्कार के दौरान इसे पढ़ने से ‘आत्मा’ या ‘जीवा’ चक्र से मुक्त हो जाता है। यह मंत्र हमें यह एहसास कराता है कि भगवान को छोड़कर इस दुनिया में जो भी आया है सब चला जाएगा। शास्त्रों की मानें तो “रा मा” बूरे विचारों व सपनों को आने से रोकता है और ये दोनों शब्द, “रा मा” हमें बूरे विचारों से जुड़ने से रोकता है। इस शब्द के प्रयोग सिर्फ बूरे विचार ही नहीं दूर होते बल्कि उसके बुरे कर्मों से भी दूर करता है। इस मंत्र से मृत के रिश्तेदारों को उसे भूलने में मदद मिलता है क्यों कि आम तौर पर एक प्रिय की मौत के बाद लोग को काफी उदास हो जाते हैं तभी उसे इस मंत्र के उच्चारण से निराशाजनक से बाहर निकलने में मदद मिलता है। इन्हीं सब कारणों की वजह से शवयात्रा में ‘राम नाम सत्य है’ बोलते हैं।

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