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शास्त्रीय नृत्य की शैलियों में भरतनाट्यम को ही क्यों माना गया है सर्वश्रेष्ठ

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indian classical dance

आज जमाना चाहे कितना भी क्यों न बदल जाए लेकिन हम अपनी संस्कृति को कभी पीछे नहीं छोड़ सकते हैं क्योंकि भारत एक सांस्कृतिक व धार्मिक देश माना जाता है। दुनिया भर में इसकी पहचान यहां के संस्कृतियों के आधार पर की जाती है। हां ये बात अलग है कि बीते कुछ समय से फिल्मी इंडस्ट्री ने हमारी कलाओं को जिस तरह से तोड़ मरोड़कर पेश किया है उसका प्रभाव लोगों के मन मस्तिक पर तेजी से पड़ रहा है। लेकिन आज भी कई सारे लोग ऐसे हैं जिन्हें अपनी लोक संस्कृति व लोक कलाओं तथा शास्त्रीय नृत्य से अत्यधिक प्रेम हैं और मौका मिलने पर वो इसका लुफ्त भी उठाना चाहते हैं।

आज हम बात करेंगे कलाओं के क्षेत्र में विशेष महत्व रखने वाले शास्त्रीय नृत्य की, जिसके भारत में कई रूप देखने को मिलते हैं। नृत्य सबसे प्राचीन कलाओं में से एक है तभी तो इसका उल्लेख वेदों में भी देखने को मिलता है। रामायण और महाभारत युग में भी नृत्य का विवरण किया गया है जो हमारी भारतीय संस्कृति की कलाप्रियता को दर्शाता है।

शास्त्रीय नृत्य की कला को दर्शाता है भरतनाट्यम

आज भी हमारे समाज में कई जगहों पर शास्त्रीय नृत्य को उतना ही महत्व दिया जाता है कि अगर कोई भी समारोह होता है तो इसके बिना संपूर्ण नहीं माना जाता। हालांकि भारत में कुछ शास्त्रीय नृत्यों को मान्यता दी गयी है जिनमें भरतनाट्यम, कथकली, ओडि़सी, कथक, कुचिपुडि़, मणिपुरी एवं कथकलि है। इसमें से सबसे ज्यादा प्राचीन व प्रचलित नृत्य है-भरतनाट्यम। भारत में इसे संपूर्ण शास्त्रीय नृत्य शैलियों में सबसे ऊपर रखा जाता है।

बता दें कि शास्त्रीय भारतीय नृत्य भरतनाट्यम की उत्पत्ति दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के मंदिरों की नर्तकियों की कला से हुई। भरतनाट्यम पारंपरिक सादिर और अभिव्यक्ति, संगीत, हरा और नृत्य के संयोजन का रूप है। यह नृत्य कला जितना हमें आकर्षित करता है उतना ही ज्यादा इस नृत्य को करने के लिए नर्तक को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। भरतनाट्यम में हाथ, पैर, मुख व शरीर संचालन के समन्वय के 64 सिद्धांत हैं, जिनकी चर्चा नृत्‍य पाठ्यक्रम के दौरान की जाती है।

खास बात तो यह है कि भरतनाट्यम को पेश करने वाली नृत्‍यकार आमतौर पर महिलाएं ही होती हैं। इसे पेश करते समय नृतक एक अलग ही मनोदशा व अभिव्‍यंजना संप्रेषित करने के लिए हस्‍त संचालन का भी प्रयोग करती हैं इस दौरान नृतक के शरीर में मानो एक अलग सा जान पड़ जाता है।

खुशी की बात तो यह है कि आज भी हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो भारत के इन विविध शास्त्रीय नृत्यों व हमारी इस सांस्कृतिक विरासत की धारा को लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने के प्रयास में लगे हुए हैं। ऐसे ही शास्त्रीय नृत्य जैसी संस्कृति को जीवित रखने का काम कर रही हैं भरतनाट्यम नृत्यांगना कल्पिता राणे।

कल्पिता राणे कहती हैं कि “नृत्य आपको हल्का और मुक्त महसूस कराता है, यह न केवल आपको आवश्यक कसरत पाने में मदद करता है, बल्कि आपके दिमाग को भी तरोताजा रखता है।”

कल्पिता राणे एक थिएटर अभिनेत्री होने के साथ ही साथ एक बेहतरीन कोरियोग्राफर और एक भरतनाट्यम व लोक नृत्य ट्रेनर भी हैं। ये अपनी इस कला का प्रसार करने के लिए अकादमी थी चलाती है जिसका नाम कल्पना संस्कृत संस्थान है। इस संस्थान की निदेशक और संस्थापक कल्पिता राणे हैं। साल 2001 से ही कल्पिता राणे अपनी कला से छात्रों को प्रशिक्षित करते आ रही है। अगर आपकी रूचि भरतनाट्यम में है और आप भारत की इस संस्कृति को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो कल्पिता राणे के ऑनलाइन सत्र से आपको काफी कुछ सीखने को मिल सकता है। इस सत्र में आपको कल्पिता राणे से फिटनेस व सहनशक्ति के लिए नृत्य, शरीर के लचीलेपन से लेकर शास्त्रीय नृत्य प्रशिक्षण व भरतनाट्यम की मूल बातें भी पता चलेंगी। इस बारे में विशेष जानकारी के लिए यहां क्लिक करें.

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