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ॐ के उच्चारण का क्या है रहस्य, जानें, हिंदू धर्म में इसका महत्व? (What is the meaning of Om, what is its importance in Hinduism?)

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ॐ

हिंदूधर्म में विश्वास करने वाले लोग ॐ का महत्व जानते है, लेकिन ऊॅं को जानने के लिए शब्द भी कम पड़ जाएंगे। कहा जाता है कि ॐ को ओम लिखने की मजबूरी है अन्यथा तो यह ॐ ही है। आप सोच रहे होंगे कि आखिर इसे उच्चारित कैसे करें? देखा जाए तो ओम का यह चिन्ह ‘ॐ’ बेहद ही अद्भुत है, ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यह अपने आप में संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है।

आधुनिक विज्ञान की माने तो जब प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्व का मूल्यांकन करता है तो इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदांत में उल्लेखित जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन किया गया है। वैसे इस सिद्धांत से विज्ञान अब धीरे-धीरे सहमत होता जा रहा है।

ओम् जो यह अक्षर है, यह सब उस ओम् का विस्तार है जिसे ब्रह्मांड कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है, बहुत-सी आकाशगंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।

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बात करें वैज्ञानिक आइंसटाइन की तो वो भी ये कहकर गए हैं कि ब्राह्मांड फैल रहा है। वहीं नहीं आइंसटाइन से पहले भगवान महावीर ने कहा था। महावीर ही नहीं इसके पहले वेदों में भी इसका जिक्र किया गया है।

ॐ को ओम कहा जाता है?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि ॐ को ओम कहा जाता है? इसके उच्चारण में अगर आपने कभी ध्यान दिया होगा तो ‘ओ’ पर ज्यादा जोर देना होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। इस मंत्र की शुरूआत तो है लेकिन अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।

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तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।

सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।

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