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आयुर्वेदिक दोष का आपके शरीर पर पड़ता है बुरा असर, जानें क्या होते हैं इसके लक्षण?

आयुर्वेदिक दोष

जब भी हम या आप बीमार पड़ते हैं, तो झट से दवाइयाँ खाकर ठीक हो जाते हैं, लेकिन फिर कुछ दिनों के बाद उसी बीमारी के चंगुल में आ जाते हैं। दरअसल, कई ऐसे रोग होते हैं, जिन्हें अगर जड़ से खत्म न किया जाए, तो वे समय समय पर आपको परेशान करते रहते हैं, जिसकी वजह से आप अवसाद के शिकार भी हो जाते हैं। वर्तमान समय में हमारी चिकित्सा प्रणाली बीमारी को जड़ से खत्म नहीं करती है, बल्कि सिर्फ कुछ देर के लिए राहत देती है। यही वजह है कि एक बार फिर से लोगों का ध्यान आयुर्वेद की तरफ आकर्षित हो रहा है, जिससे हमेशा के लिए आप रोगों से राहत पा सकते हैं। तो ऐसे में हम यहां आयुर्वेदिक दोष और उसके प्रभाव के बारे में बता रहे हैं।

आयुर्वेदिक दोष के प्रकार

आमतौर पर आयुर्वेदिक दोष के तीन प्रकार होते हैं, जो निम्नलिखित है- 

  1. वात दोष – वायु व आकाश तत्व का ज्यादा होना।
  2. पित्त दोष – अग्नि तत्व का ज्यादा होना।
  3. कफ दोष – पृथ्वी और जल तत्व का ज्यादा होना।

1. आयुर्वेदिक दोष : वात

आयुर्वेदिक दोष

वात दोष “वायु” और “आकाश” इन दो तत्वों से मिलकर बना है, जिसका स्थान काफी महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि जो तत्व शरीर में गति या उत्साह भरें, उसे वात या वायु कहते हैं। मतलब साफ है कि शरीर में होने वाली सभी प्रकार की गतियां इसी वात की वजह से होती हैं। 

मसलन, हमारे शरीर में रक्त का संचार होता है, वह भी वात के कारण ही होता है। विशेषज्ञों की मानें, तो शरीर में जितने भी खाली स्थान हैं, वहां वायु यानि वात पाई जाती है। इतना ही नहीं, एक अंग का दूसरे अंग के साथ संपर्क भी सिर्फ वायु के कारण ही संभव है।

आयुर्वेदिक दोष में इसका प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है। यह अन्य दोषों को भी शरीर के एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का काम करता है। मतलब साफ है कि अगर आपके शरीर में कोई और दोष है, तो ऐसी स्थिति में वह काफी ज्यादा बढ़ जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शरीर के अंदर होने वाली तमाम गतिविधियाँ, जिसमें गतिशीलता होती है, वो सभी वात की ही देन हैं। उदाहरण के लिए, पसीना या मल-मूत्र निकलने की प्रक्रिया भी वात की वजह से ही संभव है। 

आयुर्वेदिक दोष : वात का प्रभाव

आयुर्वेदिक दोष में प्रथम स्थान पर विराजमान वात का प्रभाव हमारे शरीर पर बहुत ही गहरा पड़ता है। जी हां, इसकी कमी से शरीर में रुखापन, दुबलापन, आवाज़ का असंतुलित होना और नींद में कमी पाई जाती है। इतना ही नहीं, ऐसे लोगों में जल्दबाजी में निर्णय लेना, जल्दी क्रोधित होना, डर जाना या फिर बातों को भूल जाने की भी आदत देखने को मिलती है। इन सबके अलावा, आंखों, भौहों, होठों, जीभ, हाथों और टांगों में भी परेशानी होती है। 

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वात का शरीर में मुख्य स्थान कोलन या पेट माना जाता है। साथ ही नाभि से नीचे का भाग, छोटी व बड़ी आंतें, कमर और जांघ आदि में भी वात निवास करता है। 

2. आयुर्वेदिक दोष : पित्त

आयुर्वेदिक दोष

आयुर्वेदिक दोष में दूसरे स्थान पर विराजमान पित्त दोष अग्नि तत्व से मिलकर बना है। पित्त शब्द का अर्थ तप होता है। मतलब साफ है कि शरीर में जो तत्व गर्मी पैदा करते हैं, वही पित्त है। बता दें कि शरीर में उत्पन्न होने वाले एंजाइम और हार्मोन को पित्त ही नियंत्रित करता है। साफ शब्दों में कहें तो हम जो कुछ भी खाते पीते या सांस द्वारा, जो हवा अंदर लेते हैं, उन्हें  खून, हड्डी और मल-मूत्र आदि में तब्दील करने का काम पित्त ही करता है।

विशेषज्ञों की मानें तो जो भी मानसिक कार्य हैं, जैसे कि बुद्धि, साहस, ख़ुशी आदि का संचालन भी पित्त द्वारा ही होता है। मतलब साफ है कि पित्त का हमारे शरीर में काफी महत्वपूर्ण स्थान है। पित्त की कमी की वजह से पाचन तंत्र में गड़बड़ी होती है। मसलन, शरीर में पित्त की कमी से कब्ज की समस्या होती है। कुल मिलाकर, उनका पेट साफ नहीं होता है। 

आयुर्वेदिक दोष : पित्त का प्रभाव

जिस तरह से वात का हमारे शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है, ठीक उसी तरह से पित्त का भी भयंकर असर होता है। जी हां, पित्त के असंतुलित होने पर पेट और आंत से जुड़ी कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं। 

जिन लोगों में पित्त की कमी होती है, उन लोगों में निम्नलिखित लक्षण पाए जाते हैं-

  • गर्मी ना बर्दाश्त कर पाना।
  • शरीर का कोमल होना।
  • त्वचा पर भूरे धब्बे हो जाना।
  • बालों का सफेद हो जाना।
  • हड्डियों के जोड़ों में ढीलापन आना।
  • बहुत ज्यादा पसीना आना।
  • मल व मूत्र अधिक होना।
  • शरीर के अंगों से बदबू आना।

आयुर्वेदिक दोष में यदि पित्त दोष ठीक रहता है, तो व्यक्ति को पेट और आंत से जुड़ी समस्याएं नहीं होती हैं और वे स्वस्थ रहते हैं। 

3. आयुर्वेदिक दोष :  कफ

आयुर्वेदिक दोष

आयुर्वेदिक दोष में कफ दोष को तीसरा स्थान प्राप्त है, जो पृथ्वी और जल इन दो तत्वों से मिलकर बना है। कफ दोष शरीर के सभी अंगों का पोषण करने के साथ ही अन्य दो दोषों को भी नियंत्रित करता है। 

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हमारी मानसिक, शारीरिक, रोग प्रतिरोध और धैर्य आदि की क्षमता कफ के गुण हैं। इसकी कमी से व्यक्ति न सिर्फ शारीरिक रुप से थका हुआ महसूस करता है, बल्कि मानसिक रुप से भी हार जाता है। 

आयुर्वेदिक दोष : कफ का प्रभाव

यदि किसी के शरीर में कफ की मात्रा में कमी आती है, तो बाकी दोनों दोष अपने आप बढ़ने लगते हैं। जिन लोगों को कफ दोष होता है, उनमें निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं- 

  • गर्मी कम लगना
  • भूख कम लगना।
  • प्यास लगना।
  • शरीर में गठीलापन होना।
  • शरीर में वीर्य की अधिकता होना।
  • कफ भारी होना।

बताते चलें कि हमारे शरीर में कफ पेट, छाती, गले का ऊपरी भाग, कंठ, सिर, गर्दन और  हड्डियों के जोड़ आदि में रहता है।यदि आपको आयुर्वेदिक दोष से संबंधित कोई समस्या है, तो आप हमारी विशेषज्ञ डॉ अंजू पांडेय से संपर्क कर सकते हैं। इन्हें इस फील्ड में काफी अनुभव है और ये आपकी परेशानियां चुटकियों में सुलझा सकती हैं।

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