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जब 21 साल के शहीद अरुण खेत्रपाल ने कहा था ‘मेरा लाहौर में गोल्फ खेलने का प्लान है’ (The charismatic martyr Arun Kshetrapal)

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जला अस्थियाँ बारी-बारी

छिटकाई जिनने चिंगारी,

जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल ।

कलम, आज उनकी जय बोल 

आज की कहानी एक ऐसे ही वीर पुत्र की है जिसकी ‘जय’ सिर्फ़ कलम ही नही बोलती, बल्कि शत्रु की ज़ुबान भी बोलती है. इतिहास में बिरले मौके ही मिलते हैं जब पुण्यवेदी पर शहीदी का जश्न मानते सैनिक को देखकर, सामने खड़े दुश्मन की आँखे भी करुणा से पसीज जाए.

बात कर रहें 14 अक्टूबर 1950 को जन्मे लेफ्टिनेंट अरूण क्षेत्रपाल की जिनको मात्र 21 वर्ष में ही शहीद होने का गौरव प्राप्त हुआ. उन्हे मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. पर हमे उन्हे कम उम्र समझने की भूल बिलकुल भी नही करनी चाहिए क्योकि बचपन से ही उनके नस-नस में सिर्फ़ देश भक्ति का लहू दौड़ता था. शहीद अरुण लेफ्टिनेंट कर्नल एम.एल.क्षेत्रपाल (जो बाद में ब्रिगेडियर बनाए गए) के बेटे हैं. अरुण क्षेत्रपाल को भारत-पाकिस्तान के बसंतर युद्ध से कुछ दिन पहले ही आर्मी के 17 पूना हॉर्स में शामिल किया गया था.

अरुण के सुनहरे जीवन से संबंधित एक अमर किस्सा है कि जब वे युद्ध की घोषणा होने की वजह से वापस 17 पूना हॉर्स जा रहे थे  तो उनके साथ एक साथी जवान भी ट्रेन में था. अरुण ने उस वक़्त आर्मी समारोह में पहने जाने वाली यूनिफॉर्म पहन रखी थी. जब उनके साथी जवान ने युद्ध के लिए सफ़र कर रहे अरुण से उनके यूनिफॉर्म पर हैरानी जताई, तो जो जवाब अरुण ने दिया वह उनके निडर इरादों और आत्मविश्वास को बयान करते हैं. अरुण ने कहा थाः

“मेरा लाहौर में गोल्फ खेलने का प्लान है और मुझे यकीन है कि वहां उस रात डिनर पार्टी होगी, जब हम युद्ध जीत जाएंगे। तब मुझे इस नीले रंग की यूनिफॉर्म की जरूरत पड़ेगी।”

1971 के इस भारत-पाकिस्तान युद्ध में दुश्मन सेना ने पश्चिम पाकिस्तान में भारतीय सेना के लिए मुश्किल हालात बना दिए थे. पाकिस्तान ने कश्मीर को पंजाब से अलग करने के लिए शकरपुर में बसंतर नदी पर सैन्य बलों का अभेद्य किले जैसा जमावड़ा कर लिया था. बसंतर का युद्ध इस दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना इसके फ़तह किए अखनूर में लडती भारतीय सेना के लिए आगे बढ़ना नामुमकिन था. भारतीय सेना के पास एक ही रास्ता बच गया था और वह था बसंतर नदी को पार करके पाकिस्तान की सीमा में सेंध मार दुश्मनों के हौसलों को पस्त करना, लेकिन यह इतना आसान नहीं था. शकरपुर में बड़ी संख्या में तैनात दुश्मन के टैंक और राहों में बिछे माइन-फील्ड्स किसी काल से कम नहीं थे. लेकिन यह इतिहास लिखने का दिन था. 

पाकिस्तानी टैंक तेजी से बसंतर नदी की और बढ़ रहे थे, जिसके सामने दीवार बन कर खड़े थे, भारत के तीन टैंक. कर्नल मल्होत्रा, लेफ्टिनेंट अहलावत और सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल भारतीय सेना की कमान संभाल रहे थे. 3 टैंकों के भीषण आक्रमण से 7 पाकिस्तानी टैंक ध्वस्त हो गए, लेकिन इस लड़ाई में कर्नल मल्होत्रा और लेफ्टिनेंट अहलावत बुरी तरह से जख्मी हो गए. ऐसे समय में पूरी जिम्मेदारी अरुण क्षेत्रपाल के कंधों पर आ गई. दुश्मन टैंक के हमले से अरुण क्षेत्रपाल के टैंक में आग लग गई. उन्हें लौटने के आदेश मिल गए, पर अरुण के दिमाग़ में कुछ और ही चल रहा था. उन्होंने निडरता से संदेश दियाः

 “मेरी बंदूक चल रही है, मैं अभी नही लौटूँगा, आउट.”

3 टैंकों से अकेले घिरे अरुण क्षेत्रपाल ने वायरलेस बंद कर दिया. देखते ही देखते पाकिस्तान के दो टैंक को उन्होंने अकेले ही उड़ा दिया. लेकिन तभी एक गोला उनके टैंक पर आकर गिरा.अरुण बुरी तरह घायल हो गए. टैंक के ड्राईवर ने टैंक वापस ले जाने की गुजारिश की, लेकिन अरुण ने मैदान में डटे रहने का आदेश दिया. दुश्मन का आखिरी टैंक उनसे मात्र 100 मीटर की दूरी पर था. दोनों ही टैंकों ने एक-दूसरे गोले दागे. इस तरह आख़िरी पाकिस्तानी टैंक का भी काम तमाम हो गया. इसके साथ ही भारत के इस वीर सपूत ने भी हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद ली.

सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल के अदभुत शौर्य और पराक्रम की वजह से भारत को न केवल एक जीत मिली, बल्कि 1971 के युद्ध का पासा ही पलट गया. बसंतर की जीत ने पाकिस्तान के हौसले पस्त कर दिए. भारतीय सेना नें इस भीषण युद्ध में पाकिस्तान के 45 टैंको के परखच्चे उड़ा दिए और दस पर कब्ज़ा कर लिया.

ऐसा ही एक रोचक किस्सा है कि युद्ध के दसकों साल बाद जब शहीदअरुण के ब्रिगेडियर पिता ब्रिगेडियर एम.एल. क्षेत्रपाल अपने जन्मस्थान पाकिस्तान गए थे, जिनकी मेजबानी कर रहे थे, पाकिस्तानी ब्रिगेडियर नसीर. दरअसल ब्रिगेडियर  क्षेत्रपाल की ख्वाहिश मरने से पहले एक बार पाकिस्तान के सरगोधा में अपने पुश्तैनी घर को देखने की थी. ब्रिगेडियर नसीर ने अरुण के पिता ब्रिगेडियर खेत्रपाल को बताया कि “यह आपके बेटे के संबंध में है, जो निश्चित रूप से भारत का हीरो है. हालांकि, उस दिन (युद्ध के दिन) हम दोनों ही सैनिक थे, एक-दूसरे से अंजान, अपने-अपने देशों की सुरक्षा और सम्मान के लिए लड़ रहे थे. मुझे आपको बताने में बेहद अफ़सोस हो रहा है कि आपके बेटे की मृत्यु मेरे हाथों हुई. अरुण का साहस आदर्श था और वह बेखौफ़ होकर अपनी जान की परवाह किए बगैर अपने टैंक के साथ बढ़ रहा था. और आख़िर में सिर्फ़ हम दोनों बचे. हम दोनों एक-दूसरे के सामने थे. हम दोनो ने ही गोले दागे। पर यह तो किस्मत थी मुझे जीना था और उसे ‘अमर’ होना था.”यह कहते कहते- कहते ब्रिगेडियर नसीर का गला रूंध आया. 

16 दिसम्बर को शहीद हुए सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. उनकी बहादुरी का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि पाकिस्तान डिफेंस की वेबसाइट पर भी अरुण खेत्रपाल की बहादुरी की कहानी को जगह दी गई है.

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