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सुदर्शन चक्र: कैसे हुई भगवान विष्णु को चक्र प्राप्ति ?(Sudarshan Chakra: How did Lord Vishnu attain the Chakra?)

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सुदर्शन चक्र

सुदर्शन चक्र को विष्णु ने उनके कृष्ण के अवतार में धारण किया था। श्रीकृष्ण ने इस चक्र से अनेक राक्षसों का वध किया था। सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र है। आज हम बात करेंगे सुदर्शन चक्र की जिसके बारे में अभी तक आपने काफी कुछ सुना होगा। बात करें सुदर्शन चक्र की तो यह भगवान विष्णु का शस्त्र है जिसे अश्वत्थामा ने मांगा था। लेकिन क्यों यह जानने से पहले पता होना बेहद जरूरी है कि आखिर सुदर्शन चक्र है क्या?

क्या है सुदर्शन चक्र ?

सुदर्शन चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था। सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। सुदर्शन चक्र ऐसा अचूक अस्त्र था कि जिसे छोड़ने के बाद यह लक्ष्य का पीछा करता था और उसका अंत कर वापस अपने स्थान पर आ जाता था। वहीं ये भी बता दें कि श्रीहरि इसे तर्जनी में धारण करते थे जिसे आज भी उनकी मूर्ति और तस्वीरों में देखा जा सकता है।

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कौन था अश्वत्थामा?

अब आपमें से कई लोग ये नहीं जानते होंगे कि अश्वत्थामा कौन था? तो बता दें कि अश्वत्थामा कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था। अश्वत्थामा के जन्म की पौराणिक कथा बहुत रोचक है। कहा जाता है कि महाभारत युध्द से पहले गुरु द्रोणाचार्य कई जगहों पर घूम रहे थें तभी वो हिमालय पर पहुंचे और वहां तमसा नदी के किनारे एक दिव्य गुफा में तपेश्वर शिवलिंग के सामने तप किया। तभी भगवान शिव उनके तप से प्रसन्न होकर संतान प्राप्ति का वरदान दिया।

जिसके कुछ समय बाद द्रोणाचार्य की पत्नी कृपि ने सुन्दर तेजश्वी बाल़क को जन्म दिया। अश्वत्थामा जब जन्में तो रोते समय उनके मुख से घोड़े के हिनहिनाने की आवाज आ रही थी, इसीलिए उनका नाम अश्वत्थामा रखा गया। जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि थी जो कि दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग की मणि की तरह दिखाई देती थी।

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क्यों मांगा था सुदर्शन चक्र ?

अब यह भी सवाल आता है कि आखिर अश्वत्थामा ने सुदर्शन चक्र क्यों मांगा था ? इसके बारे में महाभारत में उल्लेख किया गया जिसमें बताया गया कि अश्वत्थामा द्वारिका पहुंचा तो श्री कृष्ण ने उसका बहुत स्वागत किया। कुछ दिन रहने के बाद एक दिन अश्वत्थामा ने श्रीकृष्ण से कहा कि अजेय ब्रह्मास्त्र लेकर अपना सुदर्शन चक्र दे दें। कृष्ण ने कहा ठीक है मेरे किसी भी अस्त्र में से जो तुम चाहो, वो उठा लो।

लेकिन मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। अश्वत्थामा ने भगवान के सुदर्शन चक्र को उठाने का प्रयास किया लेकिन वो टस से मस नहीं हुआ। उसने प्रयास किया पर सफलता नहीं मिली, उसने हारकर भगवान से चक्र न लेने की बात कही। भगवान ने उसे समझाया कि अतिथि की अपनी सीमा होती है। उसे कभी वो चीजें नहीं मांगनी चाहिए जो उसके सामर्थ्य से बाहर हो। अश्वत्थामा बहुत शर्मिंदा हुआ। वह बिना किसी शस्त्र-अस्त्र को लिए ही द्वारिका से चला गया।

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