Read Home » हिंदी लेख पढ़ें » कल्याण और आध्यात्मिकता » पाताल भुवनेश्वर:रहस्यों से भरी पवित्र गुफा ज़हां करते हैं 33 करोड़ देवी-देवता वास

पाताल भुवनेश्वर:रहस्यों से भरी पवित्र गुफा ज़हां करते हैं 33 करोड़ देवी-देवता वास

  • द्वारा

उत्तराखंड के गंगोलीहाट के गांव भुवनेश्वर में एक बहुत ही पवित्र गुफा स्थित है नाम है पाताल भुवनेश्वर.ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र गुफा में प्रार्थना भर कर लेने से चार धाम यात्रा का पुण्य प्राप्त हो जाता है. इस स्थान के बारे में वर्णन करते हुए स्कन्द पुराण में व्यास जी कहते हैं:-

“शृण्यवन्तु मनयः सर्वे पापहरं नणाभ्‌ स्मराणत्‌ स्पर्च्चनादेव”

अर्थात व्यास जी ने कहते हैं मैं ऐसे स्थान का वर्णन करता हूं, जिसका पूजन करने के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या, स्मरण मात्र से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं। वह सरयू, रामगंगा के मध्य पाताल भुवनेश्वर है. तो आइए इस लेख में भारत के प्राचीनतम ग्रंथ स्कन्द पुराण में वर्णित पाताल भुवनेश्वर की पवित्र गुफा के रहस्यों के बारे में जानते हैं

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गुफा विशालकाय पहाड़ी के करीब 90 फुट नीचे है . पौराणिक कथा और लोकगीतों में इस भूमिगत गुफा के बारे में कहा जाता है कि यहां भगवान शिव और तैंतीस करोड़ देवता विद्यमान है. मान्यताओं के मुताबिक, इसकी पवित्र गुफा की खोज आदि शंकराचार्य ने की थी. यहां केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के दर्शन भी होते हैं. पुराणों के मुताबिक पाताल भुवनेश्वर के अलावा कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहां एकसाथ चारों धाम के दर्शन होते हो. यह पवित्र व रहस्यमयी गुफा अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हुए है.

पौराणिक कथा और लोकगीतों के मध्यम से यह दावा किया जाता है कि इस गुफा को भगवान शिव ने बनाया था. जिस गुफा में 33 कोटि देवी देवता वास करते हो, उस गुफा की अलौकिक छटा का आप अंदाज़ा लगा सकते है. इस रहस्मयी गुफा में 92 फुट तक नीचे जाना आसान नहीं है. 82 संकरी छोटी-मोटी तेडी-मेडी सीढ़ियाँ आपको गुफा के गर्भ तक ले जाती हैं, जो किसी रोमांच से कम नही है. सीढ़ियां ख़त्म होने पर 160 मीटर में फैली सराबोर गुफा, आस्था के महासमुद्र समान है. यह भी कहा जाता है कि द्वापर युग में पांडवों ने यहां चौपड़ खेला था.

सीढ़ियां ख़त्म होते ही शेषनाग जी के दर्शन होते हैं, जो विशेष आकृति में अपना फन फैलाए हुए है. मान्यता है कि शेषनाग जी ने यहां पृथ्वी को अपने फन पर उठाया था. यहां शेषनाग के रीढ़ की हड्डियां भी दिखती हैं, साथ ही उनकी विष की थैली के भी दर्शन होते है. यह दृश्य किसी अजूबे से कम प्रतीत नहीं होता.

शेषनाग के गर्भ स्थान पर हमें एक हवन कुंड दिखता है. वही हवन कुंड, जिसके बारे में एक पौराणिक कथा है कि इस हवन कुंड में राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जनमेजय ने ब्रह्मांड के समस्त सर्पो के विनाश के लिए यहां यज्ञ कराया था. पौराणिक कथाओं और हिंदू आस्थाओं के अनुसार एक ऋषि ने राजा परीक्षित को श्राप दिया था कि उनकी मौत सर्प दंश से होगी. इस वजह से इस हवन कुंड में उन्होंने यज्ञ शुरू किया. एक-एक कर सारे सर्प आकर हवनकुंड में समाने लगे, लेकिन तक्षक नामक सर्प आकर इसी गुफा में छुप गया. तक्षक एक फल में समा गया और बाद में राजा परीक्षित को डंस लिया. राजा परीक्षित की इस वजह से मौत हो गयी.

पानी के प्रवाह से बनी यह गुफा केवल एक गुफा नहीं है, बल्कि गुफाओं की एक श्रृंखला है.मानस खंड 103 अध्याय के श्लोक 275 के अनुसार कामधेनु गाय का स्तन भी गुफ़ा की छत पर देखा जाता है, जिससे वृषभेश के ऊपर सतत दुग्ध धारा प्रवाहित होती रहती है. मान्यता है कि कलयुग में अब इससे पानी टपक रहा है. कुछ और आगे बढ़ने पर हमें ब्रह्मा के हंस की टेड़ी गर्दन वाली मूर्ति के दर्शन होते हैं। पुराणो के अनुसार इस हंस को शिव ने घायल कर दिया था, क्योंकि उसने वहां रखा अमृत कुंड जूठा कर दिया था।

ब्रह्मा, विष्णु व महेश की मूर्तियां साथ-साथ स्थापित है. परंतु आश्चर्य कि बात यह है कि छत के उपर एक ही छेद से क्रमवार पहले ब्रह्मा फिर विष्णु फिर महेश की इन मूर्तियों पर पानी टपकता रहता है. अब इसे प्रकृति की देन कह लें या स्वयं प्रभु की महिमा आपको सोचने के लिए ज़रूर मजबूर कर देगा.
इस गुफा में भगवान केदारनाथ के भी दर्शन किए जा सकते है. ठीक उनके बगल में ही बद्रीनाथ विराजमान है. सामने बद्री पंचायत बैठी है, जिसमें यम-कुबेर, वरुण, लक्ष्मी, गणेश तथा गरुड़ शोभायमान है. बद्री पंचायत के ऊपरी तरफ बर्फानी बाबा अमरनाथ की गुफा है तथा पत्थर की बड़ी-बड़ी जटाएं फैली हुई हैं.अगर चारो धाम के दर्शन एक ही स्थान पर हो जाएं, तो इससे बड़ी आस्था की बात कुछ और हो हे नही सकती.

इसके आगे भगवान गणेश का कटा हुआ मस्तक शिला रूप में स्थित है. शिलामूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल है। ब्रह्मकमल से पानी भगवान गणेश के शिलारूपी मस्तक पर दिव्य बूंद टपकती है. मुख्य बूंद गणेश के मुख में गिरती हुई दिखाई देती है. ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव द्वारा इसे स्थापित किया गया है.

इसके बाद चार पाप द्वार बने हैं. माना जाता है कि तीसरा धर्मद्वार है जो कलयुग की सामप्ति पर बंद होगा. चौथा मोक्ष द्वार है. मोक्षद्वार के आगे विशाल मैदान के मध्य भाग में पुष्पों और गुच्छों से निर्मित पारिजात वृक्ष है. कहा जाता है कि द्वापर युग भगवान कृष्ण इसे देवराज इंद्र की अमरावती पुरी से मृत्युलोक में लाये थे.

इस अलौकिक गुफा में युग-युगांतर का भविष्य भी समझा जा सकता है. अगर यहां के पुजारी के कथन को सत्य मानें तो एक स्थान पर चार प्रस्तर खंड मौजूद है. इन चार प्रस्तर खंडों का तात्पर्य चार युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग से है।कहा जाता है कि पहले तीन प्रस्तर खंडों में कोई परिवर्तन नहीं होता. जबकि कलयुग का पिंड लम्बाई में अधिक है और उसके ठीक ऊपर गुफ़ा से लटका एक पिंड नीचे की ओर लटक रहा है. ऐसा मानना है कि पिंडों के मिल जाने पर कलयुग समाप्त हो जाएगा.

स्कन्दपुराण में वर्णन है कि स्वयं महादेव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी-देवता उनकी स्तुति करने यहां आते हैं.

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *