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जानिए क्यों कहा जाता है काल भैरव को काशी का कोतवाल

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काल भैरव का स्मरण करते समय आपको जरूर भय युक्त अनुभूति हो सकती है. गाढ़ा कला रंग, स्थूल शरीर, आग बरसाती बड़ी आंखें, गले में मोटी रूद्राक्ष की माला, काला वस्त्र, एक हाथ में ब्रह्माजी का कटा हुआ सिर, दूसरे हाथ में लोहे का भयानक दंड और काले कुत्ते की सवारी लेकिन इसके विपरीत काल भैरव बहुत ही दयालु-कृपालु और समस्त जन-गण का कल्याण करने वाले है.

काल भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला. काल भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता . ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है.

शिव की क्रोधाग्नि का विग्रह रूप कहे जाने वाले कालभैरव का अवतरण मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ. कथा के अनुसार एक बार देवताओं ने देवद्वय ब्रह्मा और विष्णु के समक्ष यह प्रश्न उठाया कि संपूर्ण सृष्टि में श्रेष्ठ कौन है. तो स्वाभाविक तौर पर ब्रह्मा और विष्णु जी ने खुद को श्रेष्ठ बताया. परंतु देवताओं ने यही प्रश्न जब वेदशास्त्रों से पूछा तो वेदशास्त्रों ने उत्तर दिया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है, अनादि अंनत और अविनाशी तो भगवान भोलेनाथ ही हैं.

यह बात भगवान ब्रह्मा और विष्णु को बुरी लगी। इसके बाद अपनी वर्चस्वता साबित करने के लिए दोनों ही भगवान शिव की निन्दा करने लगे. जिससे भगवान भोलेनाथ क्रोधित हो गए। रौद्र रूप में आकर महादेव तांडव करने लगे और इस वजह से प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई. पुराणों के अनुसार उसी समय भगवान भोलेनाथ के शरीर से क्रोध से कम्पायमान और विशाल दंडधारी एक प्रचंडकाय काया प्रकट हुई, जिसे महा काल भैरव के नाम से जाना जाता है.

कालभैरव के रौद्ररूप ने भगवान भोलेनाथ के अपमान का बदला लेने के लिए अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाख़ून से ब्रह्मा जी के उस पांचवें सिर को काट दिया, जिसने शंकर भगवान की निन्दा की थी. लेकिन, इसी कारण भैरव पर ब्रह्महत्या का दोष लग गया. इसलिए ऐसी मान्यता है कि ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति के लिए काल भैरव सृष्टि में भटकते हैं तत्पश्चात देवों के देव महादेव ने भैरव को अपनी पुरी, काशी का नगरपाल नियुक्त कर दिया. यहां काल भैरव को ब्रह्महत्या से मुक्ति मिली.

पुराणों के अनुसार अपनी पुरी काशी की व्यवस्था संचालन की जिम्मेदारी महादेव ने भैरव को दे रखी है. इसलिए काल भैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है. काल भैरव के दर्शन किए बगैर विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है.

मान्यता है कि बिना इनकी अनुमति के कोई काशी में नहीं रह सकता. एक पैर पर खड़े बाबा कालभैरव काशी के दंडाधिकारी हैं. इसलिए वाराणसी में जब कभी किसी प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी की नियुक्ति होती है, तो वह सर्वप्रथम बाबा काल भैरव के दर्शन करने के बाद ही अपना पद और कार्यभार संभालते हैं.

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