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गणेश चतुर्थी पर ऐसे करें पूजा, मिलेगा मनचाहा वरदान (Do this Worship on Ganesh Chaturthi)

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गणेश चतुर्थी

गणेश भगवान को प्रथम पूज्य माना जाता है, सनातन धर्म में भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का त्यौहार मनाया जाता है। हर साल की तरह की तरह इस बार भी गणेश चतुर्थी का पर्व 22 अगस्त को मनाया जाने वाला है। भगवान गणेश को गजानन या विघ्नहर्ता के नाम से भी पुकारते हैं। हालांकि गणेश भगवान को रिद्धि-सिद्धि और सुख-समृद्धि का प्रदाता माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान गणेश संकट, कष्ट, दरिद्रता और रोगों से मुक्ति दिलाते हैं। सनातन धर्म के आदि पंच देवों में श्रीगणेश एक प्रमुख देव माने जाते हैं।

कहा जाता है कि भगवान गणेश अपने भक्‍तों की बाधा, सकंट, रोग-दोष तथा दरिद्रता को दूर करते हैं। शास्‍त्रों के अनुसार माना जाता है कि गणेश चतुर्थी की विशेष पूजा का दिन बुधवार है। माना जाता है कि गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मध्याह्न काल में सोमवार, स्वाति नक्षत्र एवं सिंह लग्न में हुआ था इसलिए इस चतुर्थी को मुख्य गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी कहलाती है। इस साल यानि 2020 में यह गणेश चतुर्थी का पर्व 22 अगस्त, 2020 को मनाया जाएगा।

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गणेश चतुर्थी का मुहूर्त

गणेश पूजन के लिए मध्याह्न मुहूर्त : 11:06:04 से 13:39:41 तक
अवधिकाल : 2 घंटे 33 मिनट
समय जब चन्द्र दर्शन नहीं करना है : 09:05:59 से 21:25:00 तक

व्रत और पूजन विधि

किसी भी त्योहार में व्रत व उसके पूजन विधि का जानना बेहद आवश्यक है ऐसे में आइए जानते हैं कि गणेश चतुर्थी पर किए जाने वाले व्रत व पूजन विधि के बारे में…

इस दिन व्रत करने वाले व्यक्ति को प्रातः स्नान करने के बाद सोने, तांबे, मिट्टी की गणेश प्रतिमा लें। इसके बाद आपको कोरे कलश में कलश में जल भरकर उसके मुंह पर कोरा वस्त्र बांधकर उसके ऊपर गणेश जी को विराजमान करें। फिर इसके बाद गणेश जी को सिंदूर व दूर्वा अर्पित करके 21 लडडुओं का भोग लगाएं। ऐसा करने के बाद आप उनमें से 5 लड्डू गणेश जी को अर्पित करके शेष लड्डू गरीबों या ब्राह्मणों को बांट दें।

शाम के समय गणेश चतुर्थी की कथा, गणेश चालीसा व आरती पढ़ने के बाद अपनी दृष्टि को नीचे रखते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। आप चाहे तो इस दिन गणेश जी के सिद्धिविनायक रूप की पूजा व व्रत किया जाता है।

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गणेश चतुर्थी का क्या है महत्व

कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण पर स्यमन्तक मणि चोरी करने का झूठा कलंक लगा था जिसकी वजह से उनको अपमान का सामना करना पड़ा था। तभी नारद जी उनकी ये दशा देखकर उनको बताया कि उन्होंने भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गलती से चंद्र दर्शन किया था इसलिए वे तिरस्कृत हुए हैं।

यही नहीं नारद जी ने ये भी बताया कि इस दिन चंद्रमा को गणेश जी ने श्राप दिया था। इसलिए जो इस दिन चंद्र दर्शन करता है उसपर मिथ्या कलंक लगता है। नारद मुनि की सलाह पर श्रीकृष्ण जी ने गणेश चतुर्थी का व्रत किया और दोष मुक्त हुए जिसके बाद से ही कहा जाने लगा कि इस दिन पूजा व व्रत करने से व्यक्ति को झूठे आरोपों से मुक्ति मिलती है।

महाराष्ट्र में यह पर्व गणेशोत्सव के तौर पर मनाया जाता है। जो कि दस दिन तक चलता है और अनंत चतुर्दशी (गणेश विसर्जन दिवस) पर समाप्त होता है। इस दौरान गणेश जी को भव्य रूप से सजाकर उनकी पूजा की जाती है। अंतिम दिन गणेश जी की ढोल-नगाड़ों के साथ झांकियां निकालकर उन्हें जल में विसर्जित किया जाता है।

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इस दिन पर कुछ खास मान्यताएं हैं प्रचलित

कहा जाता है कि इस दिन चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कारण व्यक्ति को कलंक का भागी होना पड़ता है। अगर भूल से चन्द्र दर्शन हो जाए तो इस दोष के निवारण के लिए मंत्र का सिंहःप्रसेनमवधीत् , सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तकः।। इस मंत्र का कम से कम 28 या 108 बार जाप करें तभी ये दोष दूर होगा।

गणेश जी की पूजा में भूल से भी तुलसी के पत्ते (तुलसी पत्र) गणेश पूजा में इस्तेमाल नहीं हों। तुलसी को छोड़कर बाकी सब पत्र-पुष्प गणेश जी को प्रिय हैं। इसके अलावा गणेश पूजन में गणेश जी की एक परिक्रमा करने का विधान है। मतान्तर से गणेश जी की तीन परिक्रमा भी की जाती है।

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