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द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई थी ? (How did Draupadi die, the main character of Mahabharata?)

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द्रौपदी

अगर आपको भी धर्म शास्त्रों व ग्रंथों में रूचि होगी तो आप रामायण, महाभारत जैसी कथाओं को जरूर देखते होंगे। दरअसल आज हम बात करेंगे महाभारत के मशहूर पात्र द्रौपदी की जिसके बारे में आपने कई बार सुना होगा। द्रौपदी के कारण ही महाभारत भी हुआ था।

कौन थी द्रौपदी

सबसे पहले तो ये जान लें कि द्रौपदी पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री थी। द्रौपदी कोई साधारण कन्या नहीं थीं बल्कि इनका जन्म अग्निकुंड से हुआ था और यह दिव्य कन्या थी। द्रौपदी कमल की पंखुड़ी के जैसी आंखों वाली, नीले-नीले घुंघराले बालों व कोमल होंठो वाली थी। उसका रंग सांवला था। ऐसा लगता था मानों कोई देवांगना मनुष्य शरीर धारण करके सामने आ गई हो।

कहा जाता है कि जब पांडव और कौरवों ने अपनी शिक्षा पूरी की थी तो द्रोणाचार्य ने उनसे एक गुरुदक्षिणा मांगी थी। जिसके बाद द्रोणाचार्य ने वर्षो पूर्व द्रुपद से हुए अपने अपमान का बदला लेने का काम कौरवों और पांडवों को सौंपा था। द्रौपदी ने अपने जीवन में न ही किसी से कभी हार मानी और न ही वह कभी किसी से डरीं। भरी सभा में जब उन्‍हें निर्वस्‍त्र करने का दुस्‍साहस किया गया तो उन्‍होंने चुप्‍पी साधे बैठे भीष्‍म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे महान योद्धाओं की कठोर निंदा की।

पांचाली कही जाने वाली द्रौपदी को सिर्फ वही व्यक्ति जान और समझ सकता है जिसने वाकई इसकी गहराई में उतरने की कोशिश की हो। धार्मिक कथाओं की मानें तो द्रौपदी को आजीवन कुंवारी रहने का भी वरदान प्राप्त था। इस वरदान के कारण ही द्रौपदी अपने सभी पतियों के साथ समान व्यवहार कर पाती थीं। सभी पतियों के साथ पत्नी धर्म को निभाते हुए भी द्रौपदी हमेशा कुंवारी रहती थीं।

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द्रौपदी का किरदार क्यों है महत्वपूर्ण

महाभारत के अनुसार द्रौपदी सुंदर होने के साथ ही बहुत बुद्धिमान स्त्री रही होगी। जब भी पांडव कमजोर पड़े या उन्हें कोई निर्णय लेने में संकोच हुआ। द्रौपदी ने हमेशा एक पत्नी का कर्तव्य निभाया। वो ये बखूबी जानती थी कि उसे कब कितना और कहां बोलना है।

कैसे हुई थी द्रौपदी की मृत्यु

वैसे तो पांचाली को लेकर महाभारत में कई कहानियां आपने सुनी होंगी, वैसे यहां हम आपको आज बताएंगे द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई थी। बताया जाता है कि यदुवंशियों का राजपाट समाप्त हो जाने के बाद पांडवों को इसका काफी दुख हुआ। जिसके बाद युधिष्ठिर ने वेद व्यास से अनुमति लेकर राजपाट छोड़कर परलोक जाने का निश्चय किया।

यही नहीं पांडवों के स्वर्गारोहण की कहानी के बारे में भी इसमें बताया गया है, महाभारत में 18 पर्व में से एक है महाप्रस्थानिक पर्व है, जिसमें पांडवों की महान यात्रा अर्थात मोक्ष की यात्रा का उल्लेख है। भारत यात्रा करने के बाद मोक्ष प्राप्त करने के लिए पांडव द्रौपदी के साथ हिमालय की गोद में चले गए।

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बताया जाता है कि वहां मेरु पर्वत के पार उन्हें स्वर्ग का रास्ता मिला। पांचों पांडवों के साथ द्रौपदी और एक कुत्ता उनके साथ यात्रा पर था। इसी दौरान पांचाली लड़खड़ाकर गिर पड़ी। भीम ने पूछा कि उसने कभी कोई पाप नहीं किया हो तो ये कैसे गिर गईं इस पर युधिष्ठिर ने कहा कि ये हम पांचों में से अर्जुन को सबसे ज्यादा प्रेम करती थी, इतना कहकर वे उन्हें बिना देखे आगे बढ़ गए।

बताया जाता है कि इसी यात्रा के दौरान पांचाली की मृत्यु हो गई थी। इस यात्रा में एक-एक करके सारे पांडव भाई मौत की आगोश में चले गए। सबसे पहले इसमें द्रौपदी की मृत्यु हुई थी। लेकिन यहां रोचक बात ये है कि केवल युधिष्ठिर को ही स्वर्ग में प्रवेश करने की अनुमति मिली थी।

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