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गोरे हब्बा: गोबर की होली (Gore Habba: Holi of Cow Dung)

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रीति-रिवाज, परंपराएँ और मान्यताएँ हैं हर संस्कृति, धर्म या समुदाय में पीढ़ियों से चली आ रही हैं। जब हम रीती रिवाज़ों की बात कर रहे हियँ तो यह तो जानते ही हैं की कईं हमें अजीब भी लगते हैं, जैसे माइनस टेम्प्रेचर में बर्फ से ठन्डे पानी में नहाना या टमाटर से होली खेलना, हमारे देश में भी कईं ऐसे रीति-रिवाज़ और त्यौहार हैं जो हमें अजीब लगते हैं और हम में से ज़्यादातर लोगों ने उनके बारे में कभी सुना भी नहीं होता है, ऐसा ही एक उत्सव तमिलनाडु में गुमातपुरा नाम एक गाँव में होता है, जहाँ लोग गोरे हब्बा महोत्सव मनाने के लिए गाय के गोबर से होली खेलते हैं। दिलचस्प! है ना?

हम में से ज़्यादातर लोग गोबर में कदम रखने के ख़याल से भी परेशान हो जाते हैं, ये ग्रामीण इसके साथ खेलना पसंद करते हैं, तमिलनाडु के गाँव में दिवाली के कुछ दिनों बाद हर साल मनाए जाने वाले गोरे हब्बा के वार्षिक उत्सव में लोग गाय के गोबर से होली खेलते हैं और मानते हैं यह अच्छा स्वास्थ्य देता है।

इस त्यौहार के वीडियो इंटरनेट पर वायरल भी हुए जिसमें गाय के गोबर के एक छोटे से पूल में लोग खेलते हुए और आनंद लेते हुए दिखते हैं। उन्हें छोटे पूल में खेलते, उसमें नहाते और गोबर का उपयोग करते हुए दोस्ताना झगड़े करते देखा जा सकता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि न केवल गाय का गोबर हानिरहित है बल्कि यह वास्तव में कई बीमारियों को ठीक करने की शक्ति रखता है। गाय का गोबर बहुत ही प्राकृतिक है और इसके बहुत सारे औषधीय लाभ हैं। दूसरे लोग कह सकते हैं कि अगर हम एक दूसरे पर गोबर फेंकते हैं तो हमें कुछ संक्रमण या कुछ बीमारी हो जाएगी। लेकिन हमारे भगवान बीरेश्वर के भरोसे, हम गाय के गोबर में खेल रहे हैं, इसलिए हमें कुछ नहीं होता।

भारत में, गोबर का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है। यह एक स्टोव ईंधन के रूप में कार्य करता है और इसका उपयोग घरों को इन्सुलेट करने के लिए भी किया जाता है। आप गाय के गोबर को छूने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह हानिरहित है और यह वास्तव में कई बीमारियों का इलाज करने की शक्ति रखता है।

लेकिन यह परंपरा कैसे शुरू हुई?

ऐसा माना जाता है कि गाँव में एक संत के अवशेष को एक गड्ढे में रखा गया था जो एक लिंग का आकार ले चुका था और यह बाद में समय के साथ गाय के मलमूत्र से ढक गया। यहाँ तक कि गाँव के देवता, बीरेश्वर को गाय के निर्वासन का महत्व माना जाता है, यही वजह है कि, ग्रामीण स्थानीय मंदिर के पीछे बहुतायत में इस पदार्थ को फेंक देते हैं।

क्या आप इस उत्सव में भाग लेना चाहेंगे? ट्राय तो कर ही सकते हैं.

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